ख्यातिलब्ध साहित्यकार एवं संपादक जयप्रकाश मानस जी का जन्म 2 अक्टूबर, 1965, रायगढ़, छत्तीसगढ़ में हुआ। शिक्षा: एम.ए (भाषा विज्ञान) एमएससी (आईटी), विद्यावाचस्पति (मानद)। प्रकाशन: देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में 300 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित। प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रह- तभी होती है सुबह, होना ही चाहिए आँगन, अबोले के विरूद्ध। ललित निबंध- दोपहर में गाँव (पुरस्कृत)। आलोचना- साहित्य की सदाशयता। साक्षात्कार– बातचीत डॉट कॉम। बाल कविता- बाल-गीत-चलो चलें अब झील पर, सब बोले दिन निकला, एक बनेगें नेक बनेंगे, मिलकर दीप जलायें। नवसाक्षरोपयोगी- यह बहुत पुरानी बात है, छत्तीसगढ के सखा। लोक साहित्य- लोक-वीथी, छत्तीसगढ़ की लोक कथायें (10 भाग), हमारे लोकगीत। संपादन- हिंदी का सामर्थ्य, छत्तीसगढीः दो करोड़ लोगों की भाषा, बगर गया वसंत (बाल कवि श्री वसंत पर एकाग्र), एक नई पूरी सुबह कवि विश्वरंजन पर एकाग्र), विंहग (20 वीं सदी की हिंदी कविता में पक्षी), महत्वः डॉ.बल्देव, महत्वः स्वराज प्रसाद त्रिवेदी, लघुकथा का गढ़: छत्तीसगढ़, साहित्य की पाठशाला आदि। छत्तीसगढ़ी- कलादास के कलाकारी (छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम व्यंग्य संग्रह)। विविध: इंटरनेट, अपराध और क़ानून। कई पत्रिकाओं में संपादन एवं सहयोग। पुरस्कार एवं सम्मान: कादम्बिनी पुरस्कार (टाईम्स आफ इंडिया), बिसाहू दास मंहत पुरस्कार, अस्मिता पुरस्कार, अंबेडेकर फैलोशिप, दिल्ली, अंबिका प्रसाद दिव्य रजत अंलकरण, मुंशी प्रेमचंद सम्मान आदि। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास हेतु सृजन-सम्मान संस्था द्वारा विदेशों में आयोजित 11 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों के संयोजक मानस जी अंतरजाल पर साहित्यिक वेब पत्रिका ‘सृजनगाथा डॉट कॉम’ का पिछले 7-8 वर्षों से संपादन कर रहे हैं। संपर्क: जयप्रकाश मानस, एफ-3, छग माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़, 492001, मो.- 9424182664, ईमेल- srijangatha@gmail.com।
आम आदमी का सामान्य ज्ञान
नहीं होता असाधारण
आम आदमी नहीं जानता
सोना-खदान का भूगोल
काले को फक्क सफेद बनाने वाला रसायन
नाती-छंती तक के लिए बटोर लेने का अर्थशास्त्र
ज्ञान का इतना पक्का
हराम की हर चीजों का नाम जीभ पर रखा
आम आदमी नहीं जानता
झूठ को सच या सच को झूठ की तरह दिखाने की कला
चरित्र सत्यापन की राजनीति
धोखा, लूट, और षड़यंत्र का
समाज-विज्ञान
ज्ञान इतना पक्का
पहचान लेता है स्वर्ग-नरक की सरहदें
आम आदमी नहीं जानता
हँसते, मटकते, चहकते हुए चेहरों का
बाजारभाव
बाजार में ‘वन बाय वन फ्री’ का रहस्य
गैरों की हाथ-घड़ी देखकर अपने समय का मिलान
ज्ञान इतना पक्का
बूझ लेता जरूरी और गैरजरूरी का फर्क
आम आदमी नहीं जानता
तानाशाहों की रखैलों, जूतों, कपड़ों, इत्रों का बीजगणित
ईश्वर के सम्मुख रखे चढ़ावा-पेटियों में लगातार
वृद्धि की तकनीक
दुख, संत्रास, तिरस्कार,
आत्महत्या के पीछे की भौतिकी
ज्ञान इतना पक्का
कि भगवान भी बगलें झाँके
आम आदमी नहीं जानता बहुत कुछ
तो मत जाने
आप कौन होते हैं
उसे पास-फेल करने वाले
2. स्त्री
एक घर हूँ मैं
जिसके बहुत सारे झरोखे खुले नहीं हैं
एक पंछी हूँ मैं
जिसने सभी गीत गाये नही हैं
एक नदी हूँ मैं
जिसे पहुँचना है
कुछ और दूर-दूर
एक कविता हूँ मैं
जिसके बहुत सारे अर्थ खुलने बाक़ी हैं
जहाँ बचती रहेगी दुनिया
एक कविता हूँ मैं
जिसके बहुत सारे अर्थ खुलने बाक़ी हैं
जहाँ बचती रहेगी दुनिया
3. बेटियाँ
आँगन में
चहकती हुईं गौरेया
आँगन में
चहकती हुईं गौरेया
देखते-ही-देखते पहाड़ हो
गई
आख़िर एक दिन उन्हें
घोंसले से दूर कहीं खदेड़ दिया गया
लेकिन गईं कहाँ वे ढीठ !
अब वे नदी की तरह उतरती रहती हैं
उदास आँखों में
आख़िर एक दिन उन्हें
घोंसले से दूर कहीं खदेड़ दिया गया
लेकिन गईं कहाँ वे ढीठ !
अब वे नदी की तरह उतरती रहती हैं
उदास आँखों में
पारी-पारी से
4. जहाँ जाता नहीं कोई
जानेवाले हम ही होंगे
जहाँ जाता नहीं कोई
जलते दोपहर में अकेले खड़े पेड़ों के घर
जीर्ण-शीर्ण पत्तों के क़रीब
झुरमुट में डरे-दुबके खरगोश तक
फुर्सत निकालकर अपनी कमीनगी पर हँसने
थोड़ा-सा रोने, थोड़ा पछताने
रूठे हुए दोस्त को मनाने
पानी-सा बहते चले जायेंगे
बिलम नहीं जाएँगे
अपनी ऐंठन की छाँह में
मार कर आँखों पर पानी के छीटें
फिर चल ही देंगे
जहाँ नहीं जाता कोई
बचे रहेंगे ठीक उसी तरह
बच नहीं पाए
फिर भी बचे रहेंगे
अनसुने शब्द हवा में स्पन्दित
5. बचे रहेंगे
नहीं चले जाएँगे समूचे
बचे रहेंगे कहीं न कहीं
बची रहती हैं दो-चार बालियाँ
पूरी फसल कट जाने के बावजूद
भारी-भरकम चट्टान के नीचे
बची होती हैं चींटियाँ
बचे रहेंगे ठीक उसी तरह
सूखे के बाद भी
रेत के गर्भ में थोड़ी-सी नमी
अटाटूट अँधियारेवाले जंगल में
आदिवासी के चकमक में आग
लकड़ी की ऐंठन कोयले में
टूटी हुई पत्तियों में पेड़ का पता
पंखों पर घायल चिडि़यों की कशमकश
मार डाले गए प्रेमियों के सपने खत में
बचा ही रह जाता है
6. झाडू
बेर उठते ही ढूँढते हैं सब मुझे
मैं किसी कोने-अंतरे में
अकेला उदास पड़ी झाडू
हवाएँ चिढ़ाती हैं मुझे
कूड़ा-करकट बिखेरकर
चिडि़या भी
सभ्य मालिक के गंदे बच्चों की तरह
मुझे छूती तक नहीं मालकिनें
बहुत बौनी मेरी औकात
दाढ़ में माँस फँसने पर
एक मैं ही टूटने-लुटने को विवश
लेकिन जब कभी
गरीब बस्ती की लड़कियाँ उठा लेती हैं कंधों पर
इत्मीनान से बैठकर देख सकता हूँ
फक्क सफेद कपड़ा धारे शहरियों की गंदगी
अक्सर अँधेरे में चटक उठता है काँच
चुभने की आशंका से आतंकित
हर कोई मुझे घोषित कर देता है सबसे जरूरी
फिर सबकुछ जस के तस
तुम्हें क्या पता
सफाई करते हुए मुझे
मिलती होंगी कितनी मज़ेदार और खोई हुई चीजें
बुद्धिजीवी अक्सर याद करते हैं
मुक्तिबोध के बहाने मुझे
और मेरे साथ उस मेहत्तर को
जो अभी भी बहुत दूर खड़ा हँस रहा है
उन्हीं पर
7. गिरूँगा तो उठूँगा
अपने नितांत अकेले में भी
सदियों को समेटे
हर वक्त मुस्तैद
फिर से अँखुआने
घुप्प अँधेरे को चीरकर
विश्वास इतना
कि पत्थरों पर उग जाऊँ
छप्पर-छानी से झिलमिलाऊँ
डर ऐसा
कि खुद को बचाता रहूँ घुन से
चिन्ता बस यही
कि पकूँ तो गोदाम नहीं खलिहान से सीधे घर
लिवाऊँ
चाहत सिर्फ इत्ती-सी
कि बची रहूँ निखालिस और ठोस
आत्मविसर्जित दुनिया में
थोड़ी-सी नमी और
थोड़ी-सी गर्माहट के सहारे
मामूली चीज हूँ
बहा ले जाती है बारिश की छोटी-सी धार
उजाड़ देता है बतास घर-परिवार
चुग लेता है पिद्दी भर टिड्डा
इतना मामूली भी नहीं
जैसे तुम्हारे जेब का सिक्का
रह जाऊँ एक बार खनक कर
गिरूँगा तो उठूँगा हर बार पेड़ बनकर
बढ़ूँगा तो बाटूँगा छाँव सबको
8. सिर्फ़ जंगल था
नदी पहाड़ न थी
पहाड़ नदी नहीं था
पहाड़ और नदी के बीच आदमी नहीं था
आदमी के आसपास न आदमी थे, न कोई बस्ती
आदमी जंगल में था
नदी पहाड़ न थी
पहाड़ नदी नहीं था
पहाड़ और नदी के बीच आदमी नहीं था
आदमी के आसपास न आदमी थे, न कोई बस्ती
आदमी जंगल में था
जंगल में पेड़-पौधे नहीं थे, कोयल पपीहे नहीं थे
ज़मीन नहीं थी, आकाश नहीं था
आदमी था सिर्फ़
या
सिर्फ़ जंगल था आदमी में
ज़मीन नहीं थी, आकाश नहीं था
आदमी था सिर्फ़
या
सिर्फ़ जंगल था आदमी में
9. तब तक
जिन्हें अभी
डराया नहीं गया है
जिन्हें अभी
धमकाया नही गया है
जिन्हें अभी
सताया नही गया है
जिन्हें अभी लूटा
नहीं जा सका है
क्या वे सारे के
सारे निरापद हैं?
कभी भी घेरा जा
सकता है
उन्हें
हो सकता है उनकी
हत्या कर दी जाये
तब तक
क्या बहुत देरी
नहीं हो चुकी होगी ?
10. आँखे
मेरी नम हैं
जैसे आपके वैसे मेरे भी घुटने
फिर भी एक फ़र्क -
आप टेक देते कहीं भी, मेरे सहमत ही नहीं कभी
जैसे आपके वैसे मेरे भी हाथ
फिर भी एक फ़र्क -
फैलाये रहते हो आप, बाँधे रखता हूँ मैं
जैसी आपकी वैसी ही मेरी जुबां
फिर भी एक फ़र्क –
जैसे आपके वैसे मेरे भी घुटने
फिर भी एक फ़र्क -
आप टेक देते कहीं भी, मेरे सहमत ही नहीं कभी
जैसे आपके वैसे मेरे भी हाथ
फिर भी एक फ़र्क -
फैलाये रहते हो आप, बाँधे रखता हूँ मैं
जैसी आपकी वैसी ही मेरी जुबां
फिर भी एक फ़र्क –
तलवे चाटने में अव्वल आप,
खरी-टेढ़ी, अड़ी मेरी
जैसे आप वैसे मैं - यह आपका मात्र भ्रम है
अधिक हो बहुत पर वह मुझसे कुछ कम है
आँखें आपकी शरारती, आँखें मेरी नम हैं ।
जैसे आप वैसे मैं - यह आपका मात्र भ्रम है
अधिक हो बहुत पर वह मुझसे कुछ कम है
आँखें आपकी शरारती, आँखें मेरी नम हैं ।
Hindi Poems of Jayprakash Manas
मानस जी, क्या बात है? बहुत अच्छी कविताएं हैं।
जवाब देंहटाएंसुन्दर कविता
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