ख्यात
लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता स्व. प्रो. सहदेव सिंह की स्मृति में
प्रो. सहदेव सिंह ट्रस्ट की ओर से 2015 से एक विशेष सम्मान प्रारंभ किया
जा रहा है । ‘प्रो. सहदेव सिंह स्मृति सम्मान’ प्रत्येक वर्ष किसी ऐसे
चयनित लेखक को प्रदान किया जायेगा जिसके लेखन का मूल स्वर सामाजिक सुधार और
परिवर्तन हो ।
सम्मान-स्वरूप चयनित लेखक को 11,000 की राशि, प्रतीक चिन्ह, शॉल, श्रीफल,
प्रो. सहदेव सिंह रचित साहित्य आदि से सम्मानित किया जायेगा ।
ट्रस्ट द्वारा 3 सदस्यीय निर्णायक मंडल का गठन किया गया है, जिसमें आलोचक
डॉ. खगेन्द्र ठाकुर(पटना), कथाकार हरिसुमन बिष्ट(दिल्ली), निबंधकार डॉ.
रंजना अरगड़े (अहमदाबाद), पत्रकार राकेश अचल (ग्वालियर), कवि जयप्रकाश मानस
(रायपुर) संयोजक-सदस्य शामिल हैं ।
इच्छुक प्रतिभागी लेखक, प्रकाशक, प्रशंसक, साहित्यिक-सामाजिक संस्थाएँ अपनी
अनुशंसा सहित पिछले 5 वर्षों के भीतर अर्थात् 2010 से 2014 में प्रकाशित
कृतियों की 2 प्रतियाँ (कहानी संग्रह/उपन्यास/निबंध संग्रह/ आलोचना, जिसमें
सामाजिक परिवर्तन की मौलिक रचनात्मक सौंदर्य की चेष्टा हो ) संयोजक, प्रो.
सहदेव सिंह स्मृति सम्मान, एफ-3, आवासीय परिसर, छ.ग. माध्यमिक शिक्षा
मंडल, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001 के पते पर 30 नवंबर, 2015 तक
भेज सकते हैं ।
यह सम्मान रचनाकार प्रत्येक वर्ष होनेवाले अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में
प्रदान किया जायेगा ।
प्रो. सहदेव सिंह - परिचय :
प्रो. सिंह आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण समय
1928 से लेकर जीवन-पर्यंत सक्रिय रहे । चाहे वह बाल कांग्रेस कमेटी हो, या
कोई और फ़ोरम । उन्होंने कई बार जेल यात्रायें कीं किन्तु आज़ादी के बाद
कभी भी कांग्रेसी, वामपंथी या भाजपाई की तरह सत्ता का लाभ नहीं लिया । 12
वर्षों तक अध्यापन कार्य किया । 1962 में पहली बार और 1967 में दूसरी बार
उत्तरप्रदेश विधानसभा के सदस्य और विभिन्न पदों पर रहे ।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – 1. सामाजिक न्याय का संघर्ष 2. हमारे सामाजिक
विघटन की कहानी 3. जाति-उदय, विकास, विरोध परिवर्तन और अब 4. बुद्ध ने हमें
सिखाया 5. कबीर । इसके अलावा उन्होंने 30 वर्ष तक 'हमारा समाज' नामक
साप्ताहिक का प्रकाशन और संपादन किया ।
6 अगस्त 1919 को इटावा के ग्राम पाली खुर्द में जन्मे श्री सिंह ने
स्वाध्यायी छात्र के रूप में एम.ए (हिंदी व समाज शास्त्र), प्रभाकर,
साहित्य रत्न, एल.टी और एलएल.बी की डिग्री हासिल की थी ।
साहित्य और सामाजिक उत्थान को ही सदैव जीवन का ध्येय मानने वाले श्री सिंह
का निधन 18 जनवरी, 2012 को हुआ ।
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